फ्री वर्स

ये बताओ रूह कैसे बांटते हैं ?
जिस्म के हिस्से हैं जितने,
हर हिस्सों में एक रूह मिलेगी
रूह का अलग हो जाना,
क़यामत होता है
और वो क़यामत रोज़ गुज़रती है,
मेरे ऊपर,फिर कहाँ
ज़िद,गुस्सा ,तहज़ीब
कुछ याद नहीं आता,
रूह जो बिलखती है,
जिस्म रह जाता है मेरे पास,
दिन गिनती हूँ रूह के जिस्म तक लौटने के
पर अब ये सोच लिया है
उम्र भर दिन गिनना ही ठीक है,
मुझे किसीसे कोई शिकवा नहीं,
क्योंकि रूह तो बाहर ही है
दूर से देखना है बस,
जिस्म तो मशीन की मानिंद
काम करता रहेगा
कर रहा है,
जैसे बार-बार बीमार हो जाना
रूह पुर असर क्यों हो
क्योंकि तुम रूह बन कर ही तो अलग हुए
गीता में लिखा है
रूह जलती नहीं,मरती नहीं,तड़पती नहीं
इसलिए तुम बे असर हो
हम जिस्म हैं,हमें हर वो काम करना है
जो आत्माएं नहीं करतीं
और तुम आत्मा हो..मेरी
मैं जिस्म जिसे रोना है
और तुमसे उम्र भर कुछ नहीं कहना है
कुछ नहीं कहना है
#उर्मिलामाधव
25.9.2015

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