फ्री वर्स---ख़ाली कुर्सी

आज फिर एक और सुबह,
ये तुम्हारी ख़ाली कुर्सी,
बनवा देती है कभी तुम्हारे हिस्से की चाय,
मैं इसके साथ पीती हूँ अपने हिस्से की चाय,
एक चाय यूँ ही रखी रह जाती है
जानते हो मैं भी अब थकती बहुत हूँ
रोने से,सोचने से, करने पड़ते हैं,
यही सब काम बार बार
पुनरावृत्ति कर देती है काया को क्षीण,
बहुत कठिन है मेरे लिए,
किसी नए हादसे को झेल पाना,
दुनियां का सबसे मुश्किल काम,
अपने आप को छलना है,
यही मैं कर रही हूँ आज कल,
मैं बहुत कुछ देखना नहीं चाहती,
हाँ मगर बस में नहीं कुछ रोक पाना,
चाहे अंतर्मन में गहरी टीस ही हो
मन नहीं हरगिज़ रहा,कहने का,कुछ भी
कौन प्रतिपल टूट जाना चाहता है,
मैं किसीको किसलिए रोकूँ बताओ,
कोई जब बुनियाद का हिस्सा नहीं,
मैंने मन से छोड़ डाला अब सभी कुछ,
सोचती हूँ क्या ये सचमुच छोड़ डाला,
ऐसा लगता मगर शायद नहीं----
पर अकेले पाँव चलते ही रहें कोशिश
रहेगी
आज फिर से चाय रखी रह गई है,
ये तुम्हारी,और ये मेरी,
क्योंकि फिर मैं सोचती ही रह गई हूँ,
सोचना ही उम्र भर बाक़ी बचा है..
उर्मिला माधव
27.8.2015..

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge