नज़्म, पेशानी पे दर्द

एक बहुत ख़ाली सड़क प आंख से ज़्यादा नहीं,
इक ज़ुबाँ ख़ामोश हर पल चीख से लड़ती हुई,

इक अजब वहशत सी तारी सोज़-ए-पिन्हानी में ग़र्क़,
पर कभी देखा नहीं उस ज़र्द पेशानी पे दर्द

चार सू खामोशियों का शोर सा उठता हुआ,
एक तन्हा दिल ग़मों की भीड़ से लड़ता हुआ,

कितनी लंबी चुप्पियों का हौसला रखते हुए,
लब तबस्सुम का मुलम्मा ख़ूबियों से ओढ़ कर,

ख़ुद ब ख़ुद ही अपने हाथों,अपने दिल को तोड़ कर,
रोज़ उसको आते-जाते देखते रहना है  बस ....
उर्मिला माधव,
23.8.2017

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