फ़क़ीर कहते हैं

सब ही ख़ुद को फ़क़ीर कहते हैं,
शह्र में रंग-ओ-समां फिर किसलिए ?

बिन दर-ओ-दीवार ही सब रहते हैं,
दह्र में इतने मकां फिर किसलिए ?

सब मुहब्बत का ग़म ही सहते हैं,
क़ह्र में तीर-ओ-कमां फिर किसलिए?

हाथ तो पथ्थर उठाए रहते हैं,
ज़ह्र में फ़िक़्र-ए-अमां फिर किसलिए?

दरिया भी खूं से भर के बहते हैं,
बह्र में उल्फ़त रवाँ फिर किसलिए??
#उर्मिलामाधव...
30.7.2017

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