सच भी नहीं

झूठ कुछ भी नहीं और सच भी नहीं,
जो भी है तू ही है,मैं तो कुछ भी नहीं,

तेरे हाथों बनी एक तस्वीर हूँ,
तेरे हाथों लिखी एक तहरीर हूँ,
मिल्कियत हूँ तिरी,तेरी जागीर हूँ,
दह्र में तेरे जल्वों की ताबीर हूँ,
सच की और झूठ की एक तामीर हूँ,
है ज़रूरत अगर तो मैं शमशीर हूँ,

झूठ कुछ भी नहीं और ,सच भी नहीं,
जो भी है तू ही है,मैं तो कुछ भी नहीं,
उर्मिला माधव
20.7.2015

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