शहनाइयां हैं
ये नदी की धार ?.....या गहराइयां है?
या के नाज़ुक वक़्त की अंगड़ाइयां है?,
आँख है मानिंद मुर्दों के सरासर,
कान के नज़दीक ही शहनाइयां है,
ज़ह्र से नीले हैं आँखें,दिल जिगर तक,
दह्र की नज़रों में ये रानाइयां हैं,
दिल के दरवाज़े की टूटी चौखटों सी,
ख़ूबतर अब जिस्म की आराइयां हैं,
क्यूँ करें नाहक़ किसी से हम शिकायत,
साथ जब अपने फ़क़त तन्हाईयाँ हैं....
उर्मिला माधव...
14.5.2015..
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