मुस्कुराए जाती है
नींद आँखों में आये जाती है,
मुझ पै बस मुस्कुराये जाती है,
हर तरफ रौशनी का है आलम,
तीरगी मुझ पै छाये जाती है,
हुक उठती है दिल में रह-रह के,
मुझ को बेजा दुखाये जाती है,
अपने आपे में ही नहीं शायद,
जाने जोगन क्या गाये जाती है,
पर्दा दारी है बंद पलकों की,
इनमें दुनियां समाये जाती है,
सदियों पहले की कोई आहट सी,
क्यूं सितम मुझपे ढाये जाती है,
खूबरू था कभी जो रंग-ए-हिना,
फिर वो खुशबू सी आये जाती है
कोई तो होश में ले आओ मुझे,
बेख़ुदी मुझ को खाये जाती है...
उर्मिला माधव..
1.6.2015...
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