फ्री वर्स
ये तुम्हारे मन की ही परिकल्पना है
मैं जहाँ हूँ बस वहीँ हूँ,
दिन प्रतीक्षित हो गया,
अनमने हो जानती हूँ,
पर ये देखो वेदना का एक सागर,
कर नही सकती हूँ मैं इसको उजागर,
ये प्रतीक्षित मन बिलखने पर अड़ा है,
ज़िद्दी है न देखलो ये बिन तुम्हारे आये,
कब कब मानता है?
मैं चली जाऊँ तब इसके पास आना,
जो तुम्हें चुभता है वो इसको बताना,
मुझसे मत बोलो मेरे मन से तो बोलो,
इस तरह से रूठना अच्छा नहीं है,
राह सूनी लग रही है देख भी लो,
फूल चुप हैं,शूल चुप हैं,
और समय प्रतिकूल चुप है,
बोलना मुझसे नहीं कोई चाहता है,
रास्ता ये सब तुम्हारा देखते हैं,
छोड़ दो मुझको मगर इनसे न रूठो,
ये जो बस खुशबू तुम्हारी चाहते हैं,
मैं कसम देती हूँ इनके पास आओ,
फिर चले जाना....
उर्मिला माधव...
27.5,2015
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