या नईं आए होते
वो अगर मिलने यहाँ तक आये होते,
तो मेरे दिल तुम बहुत ललचाये होते,
हाथ रखते,वो फ़सीलों पै भी आख़िर
उस हथेली के निशाँ भी आये होते,
बैठ जाते घर के एक दीवान पर भी,
दर्द अपने दिल के कुछ बतलाये होते,
जो तरन्नुम दिल में रहते हैं मुसलसल,
उनके संग कोने में जाकर गाये होते,
कितने रागों की ख़नक़ है मेरे दिल में,
बैठ कर आख़िर सभी समझाए होते,
मैं समंदर पार आख़िर जाऊँ क्यूँकर,
दो क़दम वो भी तो चलकर आये होते...
नाम रख लूँ आज से मीरा मैं अपना,
फर्क क्या तब आये या नईं आये होते ....
उर्मिला माधव.....
15.5.2015
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