हिंदी गीत
भित्ति चित्रों से उकेरे शब्दअब कुछ,
जिजीविषा भी छल रही है जब स्वयं को,
जो सवेरे श्वांस में अब तक निहित थे,
आ खड़े हैं बेधने अंतर अहम् को,
दूर की अब दृष्टि धुंधलाने लगी है,
और कब तक ढोयेंगे झूठे भरम को,
उर्मिला माधव...
19.5.2015...
भित्ति चित्रों से उकेरे शब्दअब कुछ,
जिजीविषा भी छल रही है जब स्वयं को,
जो सवेरे श्वांस में अब तक निहित थे,
आ खड़े हैं बेधने अंतर अहम् को,
दूर की अब दृष्टि धुंधलाने लगी है,
और कब तक ढोयेंगे झूठे भरम को,
उर्मिला माधव...
19.5.2015...
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