शर्मिंदगी है
हमारी डायरी से....
क्या बची आँखों में कुछ शर्मिंदगी है?
या अभी तक भी मुसलसल गंदगी है?
आग दरिया में लगा कर क्या करोगे?
जिसकी फितरत ही सरासर बंदगी है,
दिल हमारा खूब दरिया है अभी तक,
इसलिए महफ़ूज़ अपनी ज़िन्दगी है......
उर्मिला माधव...
13.10.2014..
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