फ्री वर्स

तुम्हारे हाथ देखूं?
ओह लेकिन ये कहीँ ख़ाली नही,
जो हज़ारों भाग्य रेखाएं जुडी हैं,
ये तुम्हारे हाथ से पूरी हुई हैं,
किसके दरवाज़े पै कितनी बिल्लियाँ हैं,
किसकी छाती पर बरफ की सिल्लियां हैं,
कौन बिन माँ के अकेला घूमता है,
दोस्तों में कौन पी कर झूमता है,
आज तक गोदी हरी किसकी नहीं है,
कच्ची दीवारों के घर हैं,
रात दिन इनमें नहीं बस दोपहर हैं,
दोपहर होती हैं सूनी अनवरत ही ,
जो हरी होती हैं तुम्हारी आहटों से ,
दहशतों से जो भरी होती हैं वरना,
बस घिरी होती हैं अपनी चाहतों से,
और भरी होती हैं ख़ासी राहतों से,
तुम करो आबाद जाओ,
है तुम्हारी ज़िम्मेदारी..
मेरे हक़ में छोड़ जाओ
संबंधों की खींचा तानी.. .....
#उर्मिलामाधव...
14.5.2015

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