Gazal
एक आवाज़....
मैले कुचैले कपडे आँखों की इस नमी पर,
ख़ाके उतारते हैं काग़ज़ की एक ज़मीं पर,
तकलीफ को हमारी,मौज़ू बना बना कर,
उंगली चुभा रहे हैं,हालात की कमी पर,
कैसे बताएं इनको,इनकी तरह हैं हम भी,
मुफलिस तो हैं सही है,होते हैं हमको ग़म भी,
क़ुर्बान करना छोडो अपनी बुलंदियों पर,
ये ज़्यादती बड़ी है,किस्सा करो ये कम भी,
मिल जायेंगे तख़ल्लुस तमगे भी दिलबरी के,
इज्ज़त के ऊंचे मसनद,चर्चे सुख़न बरी के,
नौटंकियाँ तुम्हारी तुम नाच लो कहीं पर,
पर इससे क्या गरज है,लिखते हो सब हमीं पर,
सुल्तान इस अहद के,हालात कुछ न बदले
है आफरीं सियासत,इतिहास कुछ न बदले,
#उर्मिलामाधव...
25.4.2015
Comments
Post a Comment