सांप डसते भी रहे

बात हम समझें वो रस्ते भी रहे,
ये समझ हम खूब हँसते भी रहे,

सब के सब मुस्कान ले आते रहे,
दांव पा कर तंज कसते भी रहे

यूँ ब-ज़ाहिर दोस्त भी कहते रहे,
आस्तीं के सांप, डसते भी रहे,

हर हिमाक़त सामने आती रही,
हम मगर कसदन ही फंसते भी रहे,

थी हमारी ही रज़ा वो साथ हों,
सब पड़ोसी बनके बसते भी रहे.....
उर्मिला माधव...
16.4.2014..

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge