नज़्म, बिक रही हैं
रहे इश्क़ की अज़मतें बिक रही हैं,
अरे बे-ख़बर हसरतें बिक रही हैं,
मुहब्बत के अब क़द्रदाँ ही कहाँ हैं
फ़रेबों के दम अस्मतें बिक रही हैं,
दरीचों में बैठी वफ़ा रो रही है,
बड़ी शान से किस्मतें बिक रही हैं,
ज़रायम नज़र से कहाँ तक बचेंगे
मुहल्ले में अब जुर्रतें बिक रही हैं...Urmila Madhav
1.5.2013
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