दिखलाते रहे

इस क़दर संजीदगी से पेश वो आते रहे,
होगए गाफ़िल फ़रेब-ए ज़ीस्त हम खाते रहे,

उनकी फ़ितरत में तग़ाफ़ुल का चलन कुछ ख़ास था,
ख़ामियों को ख़ूबियों के साथ दिखलाते रहे,

अपने दिल को हमने ऐसा बदग़ुमाँ रहने दिया,
उनके सुर में सुर मिलाके गीत हम गाते रहे,

अपनी रुसवाई का चर्चा आम हो जाने दिया,
लोग जो कहते रहे हम सुनके शर्माते रहे,

अपने जीने का तरीका,अपना ना रहने दिया,
जो भी वो कहते रहे,हम वो ही दोहराते रहे..
उर्मिला माधव
29.4.2013

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