जंजीर से
"हम बँधे क्यूँ आज भी ज़ंजीर से,
कौन वाक़िफ़ है जिगर की पीर से?,
शोहदों के बेसबब जुमले सभी,
चीर जाते हैं दिलों को तीर से,
हक़ की आज़ादी कभी पाई नहीं
आँख डरती ही रही शमशीर से,
बदनीयत साजिश हज़ारों झेलकर,
बुझ गया दिल फिर उसी तासीर से,
रच गए इतिहास मुड़कर देखलो,
पाँव बाहर रख दिया जो लकीर से ।। उर्मिला माधव...."
9.4.2013
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