नज़्म
ज़िन्दगी इस तरह सम्हाली है,
पिछली यादों पै ख़ाक डाली है,
अपनी आहों पै इख़्तियार रखा,
कुछ न कहने की क़सम खाली है,
जिससे दिलने गिला किया ही नहीं,
उससे फिर रूह क्यूँ सवाली है??
अपने चेहरे की धूल देखी नहीं,
बात मजलिस में क्यूँ उछाली है??..Urmila Madhav
28.4.2013
Comments
Post a Comment