रुस्तमों का
याद क्या करना ग़मों का,
आते-जाते ...मौसमों का,
ख़ैर मक़दम ही किया है,
ज़ह्र से उन आलमों का,
क्यूं रहे शिकवा किसीसे,
उम्र भर के मातमों का,
डर कहां बाक़ी रहा अब,
गोलियों का और बमों का
सामना करते रहे जब,
कैसे-कैसे रुस्तमों का,
उर्मिला माधव,
16.4.2017
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