हासिल न था
एक तो हरगिज़ हमें रहबर तलक़ हासिल न था,
उस पै कुछ तेरा सहारा भी महे-क़ामिल न था,
रात को एक बज़्म में शिरक़त हमारी थी ज़रूर,
जाने क्यों ऐसा लगा के हम वहीँ थे,दिल न था,
बारहा कई रंग हमसे, ख़ूब टकराये ज़रूर
जो बहुत दरक़ार था वो ज़ाहिरे महफ़िल न था,
दूर से खुश्बू सी हमको एक आती थी ज़रूर,
जिसको हम देखा किये वो दिल तो था बिस्मिल न था...
बज़्म थी रंगीं बहुत और रौनकें भी थीं ज़रूर,
फिर भी कुछ तो ख़ास था जो उस जगह शामिल न था....
#उर्मिलामाधव...12.4.2015
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