मरते ही बने

ज़ीस्त की बुनियाद ऐसी है कि मरते ही बने,
इसको जितना ही समेटो ये बिखरते ही बने,
अनगिनत रानाइयाँ हैं किसको देखेंगे भला,
सूरत-ए-हालात ये कि ...सिर्फ़ डरते ही बने...
उर्मिला माधव..
11.3.2017

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