नज़्म--मैली औरत

कितनी हैरत से हमने देखा था,
चूँकि एक जाल उसने फेंका था,

साथ मैली सी एक औरत थी,
उसकी हरगिज़ न कोई शोहरत थी,

फिर भी उसको गले लगाया था,
सब को अंदाज़ ये न भाया था,

उसके पुरखों का एक बंगला था,
जिसपे लिख्खा अजीब जुमला था,

मुझको मुखिया अगर बनाओगे,
दुनियाँ भर के इनाम पाओगे,

लोग पढ़ पढ़ के उसको जाते थे,
उन को मानी समझ न आते थे,

कुछ ने सोचा ये काम करते हैं,
दर पै जा कर सलाम करते हैं,

माज़रा तब कहीं समझ आया,
चाहा वोटों का उसने सरमाया,

ऎसी बंदिश में सब चलें कैसे ??
झूठ ही ख़ुद को सब छलें कैसे?

सब के सब गोली जैसे छूट लिए,
पाँव सर पै रखे और फूट लिए......
उर्मिला माधव...
28.3.2014...

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