मर जाओगे

बे-वज्ह जिस्म पे....कितना इतराओगे,
इतनी खुद्दारी लेकर....किधर जाओगे,

जिस्म किसका हुआ...इस जहां में कहो,
हम भी मर जायेंगे,तुम भी मर जाओगे,

एक रक्क़ासा बोली ये..........गिरते हुए,
इब्न-ए-मरियम नहीं जो संभल जाओगे,

रूह मरती नहीं.........जिस्म मर जाते हैं,
जिस्म से आशिकी करके......पछताओगे,

इसका जुगराफिया....जब बिगड़ता है तब,
दो क़दम.......साथ इसके न चल पाओगे,
उर्मिला माधव...
18.3.2014...

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