चल पाया नहीं

क्या किया जाता अगर ये दिल संभल पाया नहीं,
रूह पर लिख्खा हुआ कुछ भी बदल पाया नहीं,
टूट कर ये जिस्म-ऑ-जां, लडखडाते रह गए,
उसपे भी ये दर्द फिर बाहर निकल पाया नहीं,
इस किताब-ए-ज़िन्दगी का,करता भी क्या जिल्दसाज़,
सब वरक़ बिखरे हुए थे,कुछ सह्ल पाया नहीं,
हर क़दम पर थे फ़रेब-ओ-मक्र ऑ गुस्ताखियाँ,
फिर किसी भी हाल में ये दिल बहल पाया नहीं
उम्र भर शाना-ब-शाना कौन चलता ज़ीस्त में
दो क़दम भी साथ मेरे जो कि चल पाया नहीं
उर्मिला माधव
19.2.2016

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