मिट्टी का एक बर्तन

मिट्टी का एक बर्तन बाज़ार से लेआओ,
और उसके चन्द टुकड़े तुम राख में दबाओ
और रेशमी क़फ़न से एक लाश को सजाओ,
सन्दल,अग़र की ख़ुशबू,लोबान भी जलाओ,
ग़र हो सके जो मुमकिन तो हार भी चढ़ाओ,
तह में दबा लहद के कुछ वक़्त भूल जाओ,
शाम-ओ-सहर पहुँच कर तुम मर्सिया भी गाओ,
रस्मो रिवाज़ सारे उस लाश के निभाओ,
एक रोज़ तह उलट कर देखो ज़रा लहद को,
जो एक भी मिले तो लेकर शिनाख़्त आओ,
उस लाश-ए-बे क़फन का कुछ तो निशान लाओ,
मर्ग-ए-बशर की हालत तफ़सील से बताओ,
झूठी बयानबाज़ी कुछ काम न करेगी,
इन्सान की हक़ीक़त इन्सान को सुनाओ,
अब बर्तनों के टुकड़े भी खोद कर लेआओ,
क्या ख़ाक़ होगए हैं,बर्तन के चन्द टुकड़े
बर्तन की हैसियत से इन्सान को मिलाओ,
ये तल्ख़िए हक़ीक़त हर शख़्स को दिखाओ।
उर्मिला माधव.
0.2.2013.

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