निकल पाते हैं

ग़ैर की छोड़िये,अपनों की ज़ुबाँ क्या कहने
पैने अलफ़ाज़ हैं,कब दिल से निकल पाते हैं

समेटें चाहे मगर फिर भी बिखर जाएंगे,
ख़्वाब तो ख़्वाब हैं,बस नींद में पल पाते हैं

ग़ैर पै उंगली उठाना ही काम है जिनका,
ऐसे शैतान कहाँ खुद को बदल पाते हैं ?

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