शोलों पे कौन चलता है

ये जो लावा सा बह निकलता है,
पहले सीने में ख़ूब जलता है,

सारी ये क़ारसाज़ी दिल की है,
वर्ना शोलों पै कौन चलता है ?

एक बस दर्द ही है जो हरदम,
वक़्त के साथ रुख़ बदलता है।।....
उर्मिला माधव..
15.2.2013

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