फ्री वर्स
जिंदगी,
ठहरी हुई झील सी,
और ये बिखरी हुई सी बीनाई
मंज़रों की दिलकशी,
खोई हुई सी,
शाम है धुंआ-धुंआ,
और फ़लक सुनसान सा,
गो के बिन माह-ओ-अख्त़र सा,
ग़म मगर छाती पर,
जिरह बख्तर सा,
न तीर,न तलवार,
न उसकी धार,
न किसीका प्यार,
न कोई तकरार,
न कोई सिंगार,
न कोई जीत,
न कोई हार,
कुछ नहीं समा सकता,
जिरह बख़्तर में....
उर्मिला माधव ....
23.2.2016
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