चलो छोड़ो

तमाशा बन गया आक़िल सरे महफ़िल,चलो छोड़ो,
जलाया हर तरह से दिल सरे महफ़िल,चलो छोड़ो,

नहीं आदत हमें हरगिज़ भी..रोने गिड़गिड़ाने की,
सरापा हो गए बिस्मिल सरे महफ़िल,चलो छोड़ो,

पसे पर्दा रखे ग़म सब उछाले तुमने मजलिस में,
हुए तुम बेहया क़ातिल...सरे महफ़िल,चलो छोड़ो,

हमारी शान में गुस्ताखियाँ करते मुसलसल..तुम,
किया बर्बाद मुस्तक़बिल,सरे महफ़िल चलो छोड़ो ,

मेरा दीगर कलेजा है....न कुछ बोले,न उफ़ तक की,
बताओ क्या न थी मुश्किल सरे महफ़िल,चलो छोड़ो...
उर्मिला माधव...
15.2.2016

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