संभलता नहीं है
ग़म बहुत है संभलता नहीं है,
बोझ ये मुझसे चलता नहीं है,
क्यूँ है ख़ामोश ये शहर इतना,
कोई राहों पे चलता नहीं है
किससे पूछें निशाँ मन्ज़िलों के,
एक भी शख़्स मिलता नहीं है,
बेवजह कोई शायद यहाँ पर,
घर से बाहर निकलता नहीं है,
कितनी मुश्किल हैं ये मुश्किलें भी,
क्यूँ मेरा दिल बहलता नहीं है ?
अपने दामन का साया ही देदो,
दिन में सूरज पिघलता नहीं है,
उर्मिला माधव..
23.2.2013
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