शरारत कर बैठे

इस दिल में अबस इक आग लगी,
हम ख़ुद से बगावत कर बैठे,
बेताबी-ए-दिल जब हद से बढ़ी,
घबरा के मुहब्बत कर बैठे,

अय जाओ मियां तुम आज तलक,
इक ग़म का रोना रोते हो,
एक रोज़ ये हमसे भूल हुई,
सहरा से अदावत कर बैठे,

शोलों को हवा दी ख़ुद,हमने,
अब आह भरें या मर जाएं,
सोचा ही नहीं कुछ अपने तईं,
दुनियां की हिफाज़त कर बैठे,

उम्मीद अभी तक है हमको,
हम शोलों पे चल सकते हैं
अल्लाह की मर्ज़ी किसको ख़बर,
मुमकिन है इनायत कर बैठे

दुनियां की नज़र में मत चढ़ना,
हर हाल में धोका देती है,
उस वक़्त बताओ क्या होगा,
जब आग शरारत कर बैठे,
उर्मिला माधव,
23.2.2018

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