जज़्बात आदमी

माने कि या न माने मेरी बात आदमी,
रखता नहीं है कोई भी औक़ात आदमी,

देता फिरे ख़िताब ही एक दुसरे को रोज़,
ख़ुद ठग रहा है आपही जज़्बात आदमी,

दिल भी मिले ज़रूरी नहीं,हाथ ही मिले,
पहचानता है आदमी की ज़ात आदमी,

वादा निबाहने की जुबां रस्म बन गयी,
देता फरेब ख़ुद को यूँ दिन रात आदमी,

गद्दीनशीन ख़ुद को समझता है बादशा,
तुर्रा तो ये है  उस पै करे घात आदमी,

जिंदा जला रहा है कोई ज़िन्दगी मगर,
मुर्दे में खोजता है तिलिस्मात आदमी...
उर्मिला माधव...
21.2.2014..

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