नज़्म
इंतिहा हो या आग़ाज़,फ़ानी है,बंदा नवाज़,
दहर की रानाइयां हों,
जिस्म की गोलाइयां हों,
जा-ब-जा शहनाइयां हों,
या बहुत तन्हाइयां हों,
बज रहा जो दिल का साज़,फ़ानी है,बन्दानवाज़,
नफरतों का रंग हो या,
मज़हबों की जंग हो,
या गुफ्तगू बे-ढंग हो,
या क़ाफिया कुछ तंग हो,
अब चाहे कुछ भी हो अंदाज़,फ़ानी है,बंदानवाज़....
उर्मिला माधव...
14.2.2014..
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