नज़्म

वो भी शायद रहगुज़र में साथ थे,
मैंने उनको पर कभी देखा न था,

क्यूँ न देखा उनको मेरी आँख ने,
इस क़दर मेरा चलन,ओछा न था,

क्यों किसीकी ज़िन्दगी में झांकना,
मेरी नज़रों में ये सब अच्छा न था,

दूर से पंजों के बल वो देखते थे,
हाथ चूंके मुझ तलक,पहुंचा न था,

जाने क्या-क्या कह गए,बेसाख़्ता,
एक भी तो लफ़्ज़ पर सच्चा न था,

मेरे क़द की कर गए फीता कशी,
गो के मैंने क़द कभी नापा न था,
उर्मिला माधव,
16.2.2017

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