नज़्म
जब हुस्न का आलम था,ज़ुल्फ़ों में पेच-ओ-ख़म था,
दिल कूचा-ए- जानम था,सर पे न कोई ग़म था,
क़दमों तले जहाँ था,बाँहों में आसमां था,
परवाज़ बे-अलम थी,मेरे साथ एक सनम था,
क्या दास्ताँ सुनाऊँ,आँधी सी एक आई,
सब लेगई उड़ाके,तक़दीर का क़रम था,
जब होश हमको आया,क्या आलम-ए- मंज़र था,
सब लेगया बहाके मेरे साथ जो सनम था ।। उर्मिला माधव..
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