एक मतला दो शेर
हवाओं में साज़िश घुली आ रही है,
सखावत की रंगत धुली जा रही है,
मुहब्बत को मीज़ान पर क्या रखोगे,
ज़का से लक़ा तक तुली आ रही है,
अमानत में तुमने जो की है ख़यानत
वो पोशीदगी भी खुली जा रही है
उर्मिला माधव
5.12.2016
हवाओं में साज़िश घुली आ रही है,
सखावत की रंगत धुली जा रही है,
मुहब्बत को मीज़ान पर क्या रखोगे,
ज़का से लक़ा तक तुली आ रही है,
अमानत में तुमने जो की है ख़यानत
वो पोशीदगी भी खुली जा रही है
उर्मिला माधव
5.12.2016
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