ग़ज़ल

जब अँधेरे थे ,वो पराया था।
रौशनी देख के जो आया था।
उसको दरकार सिर्फ़ खुशियाँ थीं,
मैंने तकलीफ़ में बुलाया था।
मेरी उम्मीद खुद पे कायम थी,
इससे बेहतर तो मेरा साया था।
अपने हाथों से फूंक सकती थी,
वो जो इक आशियाँ बनाया था।
क्या कहूँ जिससे ग़म कहे मैंने,
मुझपे हंसने को सिर्फ़ आया था।
ज़िन्दगी यूँ तो इक अमानत थी,
वक़्त ने जिसको लूट खाया था।
किसको जीने की इतनी ख्वाहिश थी,
रब का बस हुक्म सा बजाया था।

Urmila Madhav

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