एक ग़ज़ल

मुहब्बत नहीं,दुश्मनी भी नहीं है,
बहुत इन्तिहाई ठनी भी नहीं है,

मगर ये भी सच है कि उनसे हमारी,
कोई ख़ास अक्सर,बनी भी नहीं है,

जहाँ भी मिले बस दरूं था तक़ल्लुफ़,
कि जज़्बों में वो सनसनी भी नहीं है,

अभी तक भरी है ये दामन में मेरे,
दुपट्टे से बालू छनी भी नहीं है,

मनाई है मैंने बहुत रूह अपनी,
बहुत कोशिशें कीं,मनी भी नहीं है,
उर्मिला माधव...
२९.१२.२०१३..

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