ग़ज़ल
खून के रिश्ते जो मेरे नाम थे,
ज़िन्दगी के वास्ते इल्ज़ाम थे,
हक़ अदा करते रहे रुसवाई का,
अश्क़ मेरे जा-ब-जा बदनाम थे,
फासलों की बढ़ गयी रस्सा-कशी,
जो तग़ाफ़ुल का लिए पैग़ाम थे,
था मुहब्बत का जिन्हें दावा बहुत,
मुश्किलों के वक़्त वो नाकाम थे,
एक तिनका जो मिला सौग़ात में,
कीमती था और उसी के दाम थे,
आज उसके नाम से जिंदा हूँ मैं,
जिसके छोटे हाथ छोटे ग़ाम थे...
उर्मिला माधव...
1.4.2014...
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