एक मतला दो शेर

अपनी- अपनी कह गए सब मेरे मन में कुछ न था
अब कोई लेता भी क्या जब अंजुमन में कुछ न था,

सब की सब शादाब बेलें,सूख कर ,झडती रहीं,
हर शजर ख़ाली हुआ ऑ बस चमन में कुछ न था,

तेरी बीनाई को ये क्या होगया,गुलशन शनास ,
क्यूँ रहा ख़ामोश क्या तेरे भी मन में कुछ न था?
उर्मिला माधव...
30.12.2016

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