ग़ज़ल
किस्सा सुना रहे हैं ये वक़्त-ए-शाम किसका,
इस गुफ़्तगू में आख़िर उट्ठा है नाम किसका,
नामा निगार बनके आया है आज क़ासिद,
लाया है देखो ख़त में,किसको सलाम किसका,
नीलाम हो रहे हैं जज़्बात हर किसी के
बाज़ार में लगाया कब किसने दाम किसका?
फ़िरकःपरस्त आक़ा क्या फैसला करेंगे,
किस-किस तरह से होगा,जीना हराम किसका?
हम जी रहे हैं अब तक ज़िंदादिली के दम पर,
करना है जब सभी ख़ुद, फिर एहतराम किसका?
उर्मिला माधव..
30.8.2016
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