ग़ज़ल
दश्त जब हो ही गया मेरा कलेजा क्या करूँ,
वहशतें या हसरतें जो भी हैं लेजा, क्या करूँ ,
दिल हथेली पै रखा और साथ में इक ख़त दिया,
कुछ नहीं बाकी बचा है क्यों ये भेजा, क्या करूँ,
हर घड़ी हलकान रहना और न सोना रात भर,
और जो तनहाई दी थी,वो भी है जा, क्या करूँ,
कब तलक चल पाएगी ये एक तरफ़ा ज़्यादती,
मैं भी जानूँ हूँ तग़ाफ़ुल जा कहे जा, क्या करूँ,
मुझको सुनना ही नहीं है,तल्ख़ियों का फ़लसफ़ा,
उम्र भर तो मैंने तनहा ,ग़म सहेजा, क्या करूँ
#उर्मिलामाधव...
15.12.2014..
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