ग़ज़ल
सख़्त दिल को कूट कर कच्चा किया,
बोझ दिल का कम अज कम हल्का किया,
चाह कर भी रो नहीं पाते थे हम,
चश्म-ए-गिरयां के लिए रस्ता किया,
एक ये एहसान भी कुछ कम नहीं,
हर क़दम पर ग़म मेरा रुसवा किया,
दिल ही दिल में कब तलक, घुटता कोई,
काम कुछ दरअस्ल अब अच्छा किया...
उर्मिला माधव...
16.12.2016
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