ग़ज़ल
हम सज़ा की हद में बतलाये गए,
और यहाँ तक खींच कर लाये गए,
किस सजा के मुस्तहक हम होगये,
जाने क्या-क्या जुर्म बतलाये गए ,
मोहमल इलज़ाम हैं हम मुत्मइन हैं,
दर हकीक़त हम तो झुठलाये गए,
उफ़ पस-ए-पर्दा रखे गम छिल रहे,
और अदालत में वो दिखलाए गए,
इससे बढ़कर और क्या मायूस हों,
हर तरह ....बे-ईमान जतलाये गए....
उर्मिला माधव...
२९.८.२०१३
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