ग़ज़ल
दिल भला किसलिए सवाली है,
शाम जब रोज़ ढलने वाली है ,
चाँद भी अब नज़र नहीं आता,
जिस्म तनहा है रात काली है,
दिन के आने से कुछ नहीं होगा
रंग सूरज का भी जलाली है,
आँख कैसे सुकून पाए अब,
ज़र्रा-ज़र्रा ही बे-जमाली है,
उसको बेकार ही समझना बस
जो भी दिल रंजो ग़म से ख़ाली है,
ये लो आंखों में खून आ पहुंचा,
लाल बारिश भी होने वाली है,
हर हकीक़त से सुर्खरू होकर,
ख़ास दोज़ख़ में अब बहाली है,
उर्मिला माधव...
24.11.2014...
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