ग़ज़ल
दुनियाँ के सारे मेले,
लगते हैं बस झमेले,
सबको धता बताकर,
चलते हैं अब अकेले,
तर्जीह उसको क्या दें,
जो ज़िन्दगी से खेले,
गाहे-ब-गाहे आकर,
तकलीफ में धकेले,
सुख चैन तक हमारा,
गमख्वार बनके लेले,
फिर झूठी गुफ्तगू में,
लगते हैं कितने धेले??
हमसे न निभ सकेंगे,
ता-उम्र ये......सहेले,
उर्मिला माधव..
30.11.2013..
Comments
Post a Comment