नज़्म
एक नज़्म आप सभी दोस्तों की नज्र....
तकलीफ दी सभी ने....
बस ढंग मुख्तलिफ़ थे,
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कभी बज़्म में बुलाकर,
कभी बज़्म से हटा कर...
कभी आसमां दिखा कर,
कभी मुंह के बल गिरा कर,
कभी दिल से दिल मिला कर,
कभी दिल से कुछ जुदा कर.
कभी अंजुमन सजा कर,
कभी आशियाँ जलाकर,
कभी ज़ख्म फ़िर बढ़ा कर,
कभी झूठ ही दुआ कर,
कभी मुझसे रुख छुपा कर,
कभी रुख नया दिखा कर,
कभी खुद ही इब्तेदा कर,
कभी खुद ही इन्तहा कर,
कभी हाले दिल सुना कर,
कभी चिलमनें गिरा कर,
अच्छा चलो हटाओ,
लानत नहीं किसी पर,
अय मेरे दिल दुआ कर,
बस शुक्रिया अदा कर
बस शुक्रिया अदा कर...
उर्मिला माधव...
14.11.2014...
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