ग़ज़ल
आज भी उसकी चिता से एक धुआँ उठता सा है,
उफ़ मुसलसल मेरे भीतर कुछ कहीं घुटता सा है,
चाक़ सा दामन लिए अब कौन जीना चाहता है ,
रूह में एक आग है, दिल दर्द से कुटता सा है,
सब बिखरता सा लगे,दिल ख़ूब रोया चाहता है,
सब्र का दामन मिरे हाथों से अब छुटता सा है,
एक मुक़द्दस शख़्स ने ज़िन्दा रखा मेरा वजूद,
उसके बिन उसका दबिश्ताँ हर तरह लुटता सा है...
उर्मिला माधव...
10.8.2013
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