एक मतला एक शेर
ग़म ही ग़म तो अपने दिल में हमने पाले हैं बहोत,
क्योंकि सब खुशियों के दर पे यूँ भी ताले हैं बहोत,
क्यों रखें हम राबिता,दुनियां के झूठे रंग से,
जिसने चाहा उसने हम में ख़म निकाले हैं बहोत
उर्मिला माधव,
21.11.2016
ग़म ही ग़म तो अपने दिल में हमने पाले हैं बहोत,
क्योंकि सब खुशियों के दर पे यूँ भी ताले हैं बहोत,
क्यों रखें हम राबिता,दुनियां के झूठे रंग से,
जिसने चाहा उसने हम में ख़म निकाले हैं बहोत
उर्मिला माधव,
21.11.2016
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