सिंदूर की डिब्बी

बाज़ार में मात्र चार रुपयों की आती है,
वो सिंदूर की डिब्बी,
जो बाबू ने मेरे लिए लाखों रुपयों में खरीदी थी,
सिंदूर की डिब्बी और 
जीवन भर की गुलामी का अनुबंध,
मुझसे वो घर भी छीना था
जिसे मैं अपना समझने की भूल करती रही थी,
जहाँ अम्मा थीं,स्नेह शीला,
एक सिंदूर की डिब्बी ने उनको भी छीना था,
पराई हो जाने का ठप्पा
लगाया गया था मेरे ऊपर ,
जहाँ से आई थी वो मेरा घर नहीं था,
जहाँ आई थी वो पराया घर था,
बचपन ने यही सुना कर जवानी पर
धकेला था,तुम्हें पराये घर जाना है,
मेरा मन कभी समझ नहीं पाया,
कौन सा घर पराया था ?
अम्मा वाला या सिंदूर की डिब्बी वाला ?
कितनी बड़ी हो गई हूँ,
पर ये दोहरा विषय अभी तक समझ में नहीं आया,
मुझे लगता है औरत का कोई घर ही नहीं होता
उसकी अपनी कोई पहचान होती ही नहीं
यदि है भी तो एक औरत
सिर्फ एक औरत,
#उर्मिलामाधव

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge